Saturday, October 30, 2010

मातम

शंझा मातम मना रहा हैं

चिंगारी बुझने को हैं

राख टटोलते भरवे आज भी

रक्त सैलाब जगाने को हैं

रामलला के नाम पे

कितनो को कुर्बान किये

अपने निज स्वार्थ के खातिर

रामलला को बदनाम किये

राम तो दिल में बसते हैं

मंदिर में क्यों बैठाना

इस बयर्थ झगडे को ले के

रक्त मानव का क्यों बहाना

ना कोई हिन्दू ना कोई मुस्लिम

हर जो मरता हैं इंसान

हर झगडे में बेघर होता

मातम लाता हैं इंसान

एक तरफ देख गम का साया

खुशी मनाता हैं इंसान

कुछ हैवानो के करतब से

आज फिर शरमाया हैं इंसान

आज फिर शरमाया हैं इंसान