Thursday, August 5, 2010

कुछ बिखरे शब्द


खून बसी एक जज्ब को दिल से आवाज देता हुँ
आरी तिरछी लकीरों को एक नया अंदाज देता हुँ
मेरी कलम तो यु ही बहक जाती हैं
इस से गीतों का एक नया अल्फाज देता हुँ

लोग मेरे अरमानो को नसीहत समझ लेते हैं
मेरे बेसबर ख्यालो को फुरसत समझ लेते हैं
और अगर दो लब्ज मुस्करा बोलु
तो मेरे इस बेखयाली को मुहब्बत समझ लेते हैं

मुहब्बत चीज क्या हैं
तुम इन नाजनिनो से पूछो
कल तलक नजरे झुकती थी
आज नजरे मिलाती हैं
कल तलक सम्म-- जलती थी
आजकल महफिले सजाती हैं

सब नजरो का धोखा हैं
बस एक पाक जिन्दगी चाहिए
किसी के संग जोड़ो मुझको
उसको बेहया होने की
शर्मिंदगी चाहिए
बस एक पाक जिन्दगी चाहिए

रंग-गलियों से जब हम गुजरते हैं
तो हर खडकी से तस्वीर दिखती हैं
मन तो करता हैं उन आहटो को सुने
लेकिन हमारे पैरो में
उनके प्रेम की ज़ंजीर दिखती हैं
कब तलक वो मुझे ऐसे तडपायेंगे
मेरे नजरो से फिसलते जायेंगे
एक दिन जब उनको अहसास होगा
शायद खुद को वो मेरे कब्र पे पायेंगे

हमने उनको देखा इस कदर
चर्चा सरेआम हो गई
और एक फूल जो दे दिया
वो बदनाम हो गई

अपने लब्जो की हम कहानी कहते हैं
खुद की हम जिंदगानी कहते हैं
गिरते हर रोज नए कंधे की तलाश में
इसको भी उनकी हम मेहरबानी कहते हैं
उनके सकशियत का नशा इतना गहरा हैं
किनारे से नक़ल जाओ नहीं तो डूब के मरना हैं

Monday, August 2, 2010

संकल्प

ले आओ एक कच्ची लकड़ी
चल पत्थर निशां बनाते हैं
उठ जाग मन विश्वास भर
चछु से दरीया बहाते हैं

मन नईया कर्तब्यो से बांधू

हिम्मत का पतवार चलाते हैं

सागर के सीने पे डोलू

एक नया तस्वीर बनाते हैं
ले आओ एक कच्ची लकड़ी
चल पत्थर निशां बनाते हैं

देखो अम्बर नीचे झुक सा गया

नदियों का बहना रुक सा गया

मन में दृढ संकल्प लिया तो

सूरज का चलना रुक सा गया

ले आओ एक कच्ची लकड़ी
चल पत्थर निशां बनाते हैं

Sunday, August 1, 2010

सावन गीत


काली बदरी तो आई हरजाई

पिया का संदेशा न लाई

मेरे अंगना में..

वो मेरे अंगना में आ के इतराई

पिया का संदेशा न लाई

कई सावन ने ली आंगराई

पिया का संदेशा न लाई

भोर दोपहर वो टूक टूक ताके

हर बटोही से पूछ पूछ शरमाई

कुकुहरे ने भी कुंक लगाई

पर पिया का संदेशा न लाई

काली बदरी तो आई हरजाई

पर पिया का संदेशा न लाई