ले आओ एक कच्ची लकड़ी
चल पत्थर निशां बनाते हैं
उठ जाग मन विश्वास भर
चछु से दरीया बहाते हैं
मन नईया कर्तब्यो से बांधू
हिम्मत का पतवार चलाते हैं
सागर के सीने पे डोलू
एक नया तस्वीर बनाते हैं
ले आओ एक कच्ची लकड़ी
चल पत्थर निशां बनाते हैं
देखो अम्बर नीचे झुक सा गया
नदियों का बहना रुक सा गया
मन में दृढ संकल्प लिया तो
सूरज का चलना रुक सा गया
ले आओ एक कच्ची लकड़ी
चल पत्थर निशां बनाते हैं
No comments:
Post a Comment