Friday, May 7, 2010

मदिरालय डगर


हम मदिरालय निशदिन जाते थे

हम जाम से जाम टकराते थे

आंशुओ के निशब्द प्रवाह को

हम मदिरा संग पी जाते थे

एक दिन मदिरालय के सुनी डगर पे

वो मिली अचानक मुग्ध हवा सी

थोडी सरमायी थोडी लहरायी

दिल को कुछ अहसास हुआ

आँखों में जो देखा उसके

नशे मदिरा का आभास हुआ

पास बुलाया उसने मुझको

न जाने क्या बात हुई

वो आँखों से छलकाती गई

हम होठो से पीते ही गए

हम जाम से जाम टकराते रहे

हर जाम पे होश खोते ही गए

हम भूल गए मदिरालय को

पर नही भूले मदिरालय जाना

वो रहती थी उस सुनी डगर पे

जिसपे था मदिरालय जाना

मदिरालय में वो आंनद कहा

जो मिला मुझे मदिरालय डगर पे

मदिरालय एक बंद कुँआ हैं

मदिरालय डगर एक बहती धारा

हम मदिरालय निशदिन जाते हैं

पर बीच डगर रुक जाते हैं

अब प्याले की क्या फ़िक्र हमें

वो अँखियों से छलकाते हैं

हम होठो से पी जाते हैं

हम मदिरालय निशदिन जाते हैं

पर बीच डगर रुक जाते हैं



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