Friday, May 7, 2010

"चाह "


उड़ती पतंगों को देखा
यु ही उड़ने की चाह
बहती नदियों को देखा
यु ही बहने की चाह
खाली तल्लैयो को देखा
नीर बन भर जाने की चाह
उचे पर्वतों को देखा
गगन चुमने की चाह
काली घटाओ को देखा
निर्झर बरसने की चाह
मरू में पगडंडीयो को देखा
एक मार्गद्रिष्टि की चाह
भुख से बिलबिलाते बच्चे को देखा
एक निवाला बनजाने की चाह
लड़खड़ाते आशिक को देखा
एक मधुप्याला बन जाने की चाह
ऐसे हजारो आशिकों के लिए
एक मधुशाला बनवाने की चाह
एक मधुशाला बनवाने की चाह

2 comments:

  1. good one...per pata nahi kyon, mujhe ye kavita ka starting 3 idiots ke "urti patang sa tha wo" se inspired lag raha hai, but still... bahut achche...

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  2. nice poem,
    i think,u should write the poem on the matter of dream(how to villagers see the big dream nd how they success)

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