
नारी एक सम्मान की मुरत
पंक्ति को आलोकित देखा मैंने
सम्मान तो बाजार में बिकती
और मूरत घर पे रखा मैंने
नारी तेरा जीवन आमूल्य हैं
पंक्ति को आलोकित देखा मैंने
हर चौराहे पे मूल्य लगाये
फ़िर भी जीवन उसमे देखा मैंने
नारी अब आश्रित और कमजोर नही
पंक्ति को आलोकित देखा मैंने
हर दिन तलाशती नए आश्रय को
जीरो फिगर के चाह में उसको
और भी कमजोर देखा मैंने
आज मुझको शर्म हैं आता
नारी का जब ये रंग दिख जाता
माँ के रूप में सम्मानित थी नारी
बहन के रूप में प्यारी थी नारी
पत्नी के रूप में संगिनी थी नारी
आज एक अलग रूप हैं देखा
मनचलों की रंगीनी हैं नारी
नारी हैं तू सम्मान की मूरत
ना बनना किसी की ज़रूरत
न बनना किसी की ज़रूरत
Very nice expression with solid logics.. Hats off for this great thought...
ReplyDeleteu r growing day by day........too gud :)
ReplyDeleteyehi to vyatha hai ....Nari ke kai roop hain...shashtroon mein bhi likha hai ( jahan tak meri samajh hai ) ....Pata nahi kyon hindi ke kavi itne kathor kyon hain ????Ajeeb Vidambana hai yeh !!
ReplyDeleteNari samay ke sath roop hi to badal rahi hai !! wo to purush hi hai ...jo nari ko har vastra mein nanga dekhta hai ! Draupadi se Aajki(koi bhi chalchitra abhinetri ) Tak