Wednesday, March 17, 2010

बैरी पिया


उसके मन की ब्याकुल ब्यथा

हर आहट पे चौकस होती

पीपल के छाव तले

फिर मृगनयनी बाट जोहती

परदेसी पिपीहा छोर गया

विरह की ज्वाला जोड़ गया

सुर्यतपन अब सहनिए लगे

अंतःतपन पीड़ा के आगे

मेघदूत का राह देखती

कोई संदेशा लायेगा

बैरी पिया के आहट का

एक छोटी सी धुल दे जायेगा

मेघ दूत आये सिहरे से

मोटी मोटी बुँदे ले आये

सुर्यतपन कमजोर हुआ

पर अन्तः तपन को रोक न पाए

बारिश में भीगी मृगनयनी

अंदर की ज्वाला फिर भभकी

ज्वाला के चितचोर प्रवाह में

जलती रही वो जलती रही

बैरी पिया के राह जोहती

जलती रही वो जलती रही

No comments:

Post a Comment