
तुलिका लिया सौ रंग लिए
सोचा कुछ चित्रांकन करू
पुरुषों के इस आदम्य समाज में
नारी का मुल्यांकन करू
सोचा कहा से शुरु करू
जब घर वो लक्ष्मी बन आती हैं
कही रौनक कही उदासी
कही तो मातम ही छा जाती हैं
बाबुल के आंगन में वो
एक कली सी खिल जाती हैं
घर मर्यादा का बोझ लिए
समानता की होड़ लिए
गिरती हैं फिसलती हैं
मन में कुछ संकल्प लिए
पर्वत सिखा चढ़ जाती हैं
तभी घरांगन के दहलीज पे
एक बुलावा आता हैं
काफी मोलतोल हैं होती
फ़िर कही बात बन जाती हैं
बीते जीवन को भूल
नई रंग चढ़ जाती हैं
घर आँगन सब बदला
पहले बेटी अब पत्नी
के रूप में सजती हैं
घर आँगन को संसार समझ
एक नए रंग में रंगती हैं
ये रंग भी फीका हुआ तो
माँ का रंग चढ़ जाता हैं
उस छोटे से घर आँगन में
दादी वो बन जाती हैं
अमृतुल्या वो जीवन को छोर
मृत्य सैया पे सज जाती हैं
मर्यादा का बोझ लिए
जीते जी मर जाती हैं
कौन से रंग में रंगु नारी को
मैं कुछ समझ नही पता हु
पुरुषों के आदम्य समाज में
मैं नारी को शीश झुकता हु
नारी को शीश झुकता हु
dis post shows u respect women in every form.......hat's off mann.....according to me its ur best post till date..keep going!!!!
ReplyDeletevery nice poem... Hat's off for such descriptions..
ReplyDeleteSahee hai...hamein ek naya KAVI mil gaya, jismei Mahavakavi ban ne kee kaabliyat hai.
ReplyDeleteKya pata next Gen ke bachche VIKASH SINGH "GURUDEV" ke kavitaaon ka Prasng, Sandarbh aur Vyakhya likhein...
Vah.... vah... vah... vah............... jintna likhu kam hai. Ye gahrai kanha se laye ho, vajan bi bahut hai.
ReplyDeleteKuch virah/judai ke bare me likho.
again hat's off to you for Nari poem.
Best fo luck for next