Monday, October 5, 2009

नारी रंग


तुलिका लिया सौ रंग लिए
सोचा कुछ चित्रांकन करू
पुरुषों के इस आदम्य समाज में
नारी का मुल्यांकन करू

सोचा कहा से शुरु करू
जब घर वो लक्ष्मी बन आती हैं
कही रौनक कही उदासी
कही तो मातम ही छा जाती हैं
बाबुल के आंगन में वो
एक कली सी खिल जाती हैं
घर मर्यादा का बोझ लिए
समानता की होड़ लिए
गिरती हैं फिसलती हैं
मन में कुछ संकल्प लिए
पर्वत सिखा चढ़ जाती हैं

तभी घरांगन के दहलीज पे
एक बुलावा आता हैं
काफी मोलतोल हैं होती
फ़िर कही बात बन जाती हैं
बीते जीवन को भूल
नई रंग चढ़ जाती हैं
घर आँगन सब बदला
पहले बेटी अब पत्नी
के रूप में सजती हैं
घर आँगन को संसार समझ
एक नए रंग में रंगती हैं

ये रंग भी फीका हुआ तो
माँ का रंग चढ़ जाता हैं
उस छोटे से घर आँगन में
दादी वो बन जाती हैं
अमृतुल्या वो जीवन को छोर
मृत्य सैया पे सज जाती हैं
मर्यादा का बोझ लिए
जीते जी मर जाती हैं

कौन से रंग में रंगु नारी को
मैं कुछ समझ नही पता हु
पुरुषों के आदम्य समाज में
मैं नारी को शीश झुकता हु
नारी को शीश झुकता हु

4 comments:

  1. dis post shows u respect women in every form.......hat's off mann.....according to me its ur best post till date..keep going!!!!

    ReplyDelete
  2. very nice poem... Hat's off for such descriptions..

    ReplyDelete
  3. Sahee hai...hamein ek naya KAVI mil gaya, jismei Mahavakavi ban ne kee kaabliyat hai.

    Kya pata next Gen ke bachche VIKASH SINGH "GURUDEV" ke kavitaaon ka Prasng, Sandarbh aur Vyakhya likhein...

    ReplyDelete
  4. Vah.... vah... vah... vah............... jintna likhu kam hai. Ye gahrai kanha se laye ho, vajan bi bahut hai.
    Kuch virah/judai ke bare me likho.

    again hat's off to you for Nari poem.
    Best fo luck for next

    ReplyDelete