Saturday, October 30, 2010
मातम
चिंगारी बुझने को हैं
राख टटोलते भरवे आज भी
रक्त सैलाब जगाने को हैं
रामलला के नाम पे
कितनो को कुर्बान किये
अपने निज स्वार्थ के खातिर
रामलला को बदनाम किये
राम तो दिल में बसते हैं
मंदिर में क्यों बैठाना
इस बयर्थ झगडे को ले के
रक्त मानव का क्यों बहाना
ना कोई हिन्दू ना कोई मुस्लिम
हर जो मरता हैं इंसान
हर झगडे में बेघर होता
मातम लाता हैं इंसान
एक तरफ देख गम का साया
खुशी मनाता हैं इंसान
कुछ हैवानो के करतब से
आज फिर शरमाया हैं इंसान
आज फिर शरमाया हैं इंसान
Thursday, August 5, 2010
कुछ बिखरे शब्द

खून बसी एक जज्ब को दिल से आवाज देता हुँ
आरी तिरछी लकीरों को एक नया अंदाज देता हुँ
मेरी कलम तो यु ही बहक जाती हैं
इस से गीतों का एक नया अल्फाज देता हुँ
लोग मेरे अरमानो को नसीहत समझ लेते हैं
मेरे बेसबर ख्यालो को फुरसत समझ लेते हैं
और अगर दो लब्ज मुस्करा बोलु
तो मेरे इस बेखयाली को मुहब्बत समझ लेते हैं
मुहब्बत चीज क्या हैं
तुम इन नाजनिनो से पूछो
कल तलक नजरे झुकती थी
आज नजरे मिलाती हैं
कल तलक सम्म-इ- जलती थी
आजकल महफिले सजाती हैं
सब नजरो का धोखा हैं
बस एक पाक जिन्दगी चाहिए
किसी के संग न जोड़ो मुझको
उसको बेहया होने की
न शर्मिंदगी चाहिए
बस एक पाक जिन्दगी चाहिए
रंग-गलियों से जब हम गुजरते हैं
तो हर खडकी से तस्वीर दिखती हैं
मन तो करता हैं उन आहटो को सुने
लेकिन हमारे पैरो में
उनके प्रेम की ज़ंजीर दिखती हैं
कब तलक वो मुझे ऐसे तडपायेंगे
मेरे नजरो से फिसलते जायेंगे
एक दिन जब उनको अहसास होगा
शायद खुद को वो मेरे कब्र पे पायेंगे
हमने उनको देखा इस कदर
चर्चा सरेआम हो गई
और एक फूल जो दे दिया
वो बदनाम हो गई
अपने लब्जो की हम कहानी कहते हैं
खुद की हम जिंदगानी कहते हैं
गिरते हर रोज नए कंधे की तलाश में
इसको भी उनकी हम मेहरबानी कहते हैं
उनके सकशियत का नशा इतना गहरा हैं
किनारे से नक़ल जाओ नहीं तो डूब के मरना हैं
Monday, August 2, 2010
संकल्प
चल पत्थर निशां बनाते हैं
उठ जाग मन विश्वास भर
चछु से दरीया बहाते हैं
मन नईया कर्तब्यो से बांधू
हिम्मत का पतवार चलाते हैं
सागर के सीने पे डोलू
एक नया तस्वीर बनाते हैं
ले आओ एक कच्ची लकड़ी
चल पत्थर निशां बनाते हैं
देखो अम्बर नीचे झुक सा गया
नदियों का बहना रुक सा गया
मन में दृढ संकल्प लिया तो
सूरज का चलना रुक सा गया
ले आओ एक कच्ची लकड़ी
चल पत्थर निशां बनाते हैं
Sunday, August 1, 2010
सावन गीत
Friday, May 7, 2010
"चाह "

उड़ती पतंगों को देखा
यु ही उड़ने की चाह
बहती नदियों को देखा
यु ही बहने की चाह
खाली तल्लैयो को देखा
नीर बन भर जाने की चाह
उचे पर्वतों को देखा
गगन चुमने की चाह
काली घटाओ को देखा
निर्झर बरसने की चाह
मरू में पगडंडीयो को देखा
एक मार्गद्रिष्टि की चाह
भुख से बिलबिलाते बच्चे को देखा
एक निवाला बनजाने की चाह
लड़खड़ाते आशिक को देखा
एक मधुप्याला बन जाने की चाह
ऐसे हजारो आशिकों के लिए
एक मधुशाला बनवाने की चाह
एक मधुशाला बनवाने की चाह
मदिरालय डगर

हम मदिरालय निशदिन जाते थे
हम जाम से जाम टकराते थे
आंशुओ के निशब्द प्रवाह को
हम मदिरा संग पी जाते थे
एक दिन मदिरालय के सुनी डगर पे
वो मिली अचानक मुग्ध हवा सी
थोडी सरमायी थोडी लहरायी
दिल को कुछ अहसास हुआ
आँखों में जो देखा उसके
नशे मदिरा का आभास हुआपास बुलाया उसने मुझको
न जाने क्या बात हुई
वो आँखों से छलकाती गई
हम होठो से पीते ही गए
हम जाम से जाम टकराते रहे
हर जाम पे होश खोते ही गए
हम भूल गए मदिरालय को
पर नही भूले मदिरालय जाना
वो रहती थी उस सुनी डगर पे
जिसपे था मदिरालय जाना
मदिरालय में वो आंनद कहा
जो मिला मुझे मदिरालय डगर पे
मदिरालय एक बंद कुँआ हैं
मदिरालय डगर एक बहती धारा
हम मदिरालय निशदिन जाते हैं
पर बीच डगर रुक जाते हैं
अब प्याले की क्या फ़िक्र हमें
वो अँखियों से छलकाते हैं
हम होठो से पी जाते हैं
हम मदिरालय निशदिन जाते हैं
पर बीच डगर रुक जाते हैं
नशा उन आँखों का
1.
तेरी आंखें नशे का पैमाना हैं
जिस्मे डूबा ये सारा ज़माना हैं
कोइ मुझे इन आंखों का रास्ता बता दो
आज मुझे भी उन्मे डूब जाना हैं
जाने क्या बात है दिल मे
जो ज़ुबा पर आ नही पाती
जज़्बात जो हैं मेरे दिल में
उन्हे लफ़्ज़ो की राह मिल नहि पाती
ये सच है कभी मैं भी ज़िन्दा था
ज़िन्दा मैं आज भी हूं पर मुझ्मे जान नहि
जीता हूं,सांस लेता हूं आज भी
पर तुम बिन मेरी कोइ पह्चान नही
एक आरमान है मेरे दिल में
जिसे में अपने दिल में दबाये बैठा हूं
जुदा हुए ज़माने बीत गयें
तुम्हरी याद को आज भी सीने से लगाये बैठा हूं
2.
तेरे आँखों के मेहनताने मे
आज फिर सम्मा जला पैमाने में
कितने आशिक हुए अनजाने में
तेरे आँखों के मेहनताने में
देखो सड़के भी डूबी हैं नशे में
कही लडखडाते पैर
कही गिरे हैं जान
ये सब छलके हैं मयखाने से
तेरे आँखों के मेहनताने में
आज फिर सम्मा जला पैमाने में
कितने गर्दिशो के धुल बने
कितने सहिलो के फूल बने
ये कातिल नजरे शूल बने
दिल टूटते हैं यहाँ अनजाने में
फिर नया छलका जाम मयखाने में
तेरे ही आशिकाने में
आज फिर सम्मा जला पैमाने में
३
छलका जाम आँखों से
पैमाना बन
उन्होंने जो मुड के देखा
आशियाना बन
इन आँखों से वो पिला दे
गर एक बूंद शराब का
नाचूँगा सारी उम्र
मैं दीवाना बन
वो कातिल निगाहे मुझको
इस कदर चाहती हैं
मैं रास्ते का फूल
नजराना बन
देखो किस कदर लोग
हुए हैं दीवाने
आज उनके दर पे ही
मयखाना बन
छलका जाम आँखों से
पैमाना बन
४
छलकते होठो से छू के
होठो को उन्होंने प्याला बना डाला
पास आई कुछ ऐसे वो
जिन्दगी को उन्होंने मधुशाला बना डाला
गर्म सांसो की छुअन हैं ऐसी
हर आहट की धरकन हैं ऐसी
कब तलक रोके हम भी
थिरकते बाहों को उन्होंने माला बना डाला
आँखों में मदभरी हया हैं छाई
जाम प्याले से छलक हैं आई
जाते जाते उनकी आँख भर आई
फ़िर से मेरे जिन्दगी को हाला बना डाला
Wednesday, March 17, 2010
बैरी पिया
उसके मन की ब्याकुल ब्यथा
हर आहट पे चौकस होती
पीपल के छाव तले
फिर मृगनयनी बाट जोहती
परदेसी पिपीहा छोर
विरह की ज्वाला जोड़
सुर्यतपन अब सहनिए लगे
अंतःतपन पीड़ा के आगे
मेघदूत का राह देखती
कोई संदेशा लायेगा
बैरी पिया के आहट का
एक छोटी सी धुल दे जायेगा
मेघ दूत आये सिहरे से
मोटी मोटी बुँदे ले आये
सुर्यतपन कमजोर हुआ
पर अन्तः तपन को रोक न पाए
बारिश में भीगी मृगनयनी
अंदर की ज्वाला फिर भभकी
ज्वाला के चितचोर प्रवाह में
जलती रही वो जलती रही
बैरी पिया के राह जोहती
जलती रही वो जलती रही
