Friday, May 7, 2010

"चाह "


उड़ती पतंगों को देखा
यु ही उड़ने की चाह
बहती नदियों को देखा
यु ही बहने की चाह
खाली तल्लैयो को देखा
नीर बन भर जाने की चाह
उचे पर्वतों को देखा
गगन चुमने की चाह
काली घटाओ को देखा
निर्झर बरसने की चाह
मरू में पगडंडीयो को देखा
एक मार्गद्रिष्टि की चाह
भुख से बिलबिलाते बच्चे को देखा
एक निवाला बनजाने की चाह
लड़खड़ाते आशिक को देखा
एक मधुप्याला बन जाने की चाह
ऐसे हजारो आशिकों के लिए
एक मधुशाला बनवाने की चाह
एक मधुशाला बनवाने की चाह

मदिरालय डगर


हम मदिरालय निशदिन जाते थे

हम जाम से जाम टकराते थे

आंशुओ के निशब्द प्रवाह को

हम मदिरा संग पी जाते थे

एक दिन मदिरालय के सुनी डगर पे

वो मिली अचानक मुग्ध हवा सी

थोडी सरमायी थोडी लहरायी

दिल को कुछ अहसास हुआ

आँखों में जो देखा उसके

नशे मदिरा का आभास हुआ

पास बुलाया उसने मुझको

न जाने क्या बात हुई

वो आँखों से छलकाती गई

हम होठो से पीते ही गए

हम जाम से जाम टकराते रहे

हर जाम पे होश खोते ही गए

हम भूल गए मदिरालय को

पर नही भूले मदिरालय जाना

वो रहती थी उस सुनी डगर पे

जिसपे था मदिरालय जाना

मदिरालय में वो आंनद कहा

जो मिला मुझे मदिरालय डगर पे

मदिरालय एक बंद कुँआ हैं

मदिरालय डगर एक बहती धारा

हम मदिरालय निशदिन जाते हैं

पर बीच डगर रुक जाते हैं

अब प्याले की क्या फ़िक्र हमें

वो अँखियों से छलकाते हैं

हम होठो से पी जाते हैं

हम मदिरालय निशदिन जाते हैं

पर बीच डगर रुक जाते हैं



नशा उन आँखों का



1.
तेरी आंखें नशे का पैमाना हैं
जिस्मे डूबा ये सारा ज़माना हैं
कोइ मुझे इन आंखों का रास्ता बता दो
आज मुझे भी उन्मे डूब जाना हैं

जाने क्या बात है दिल मे
जो ज़ुबा पर नही पाती
जज़्बात जो हैं मेरे दिल में
उन्हे लफ़्ज़ो की राह मिल नहि पाती

ये सच है कभी मैं भी ज़िन्दा था
ज़िन्दा मैं आज भी हूं पर मुझ्मे जान नहि
जीता हूं,सांस लेता हूं आज भी
पर तुम बिन मेरी कोइ पह्चान नही

एक आरमान है मेरे दिल में
जिसे में अपने दिल में दबाये बैठा हूं
जुदा हुए ज़माने बीत गयें
तुम्हरी याद को आज भी सीने से लगाये बैठा हूं

2.
तेरे आँखों के मेहनताने मे
आज फिर सम्मा जला पैमाने में
कितने आशिक हुए अनजाने में
तेरे आँखों के मेहनताने में

देखो सड़के भी डूबी हैं नशे में
कही लडखडाते पैर
कही गिरे हैं जान
ये सब छलके हैं मयखाने से
तेरे आँखों के मेहनताने में
आज फिर सम्मा जला पैमाने में

कितने गर्दिशो के धुल बने
कितने सहिलो के फूल बने
ये कातिल नजरे शूल बने
दिल टूटते हैं यहाँ अनजाने में
फिर नया छलका जाम मयखाने में
तेरे ही आशिकाने में
आज फिर सम्मा जला पैमाने में


छलका जाम आँखों से

पैमाना बन गया

उन्होंने जो मुड के देखा

आशियाना बन गया

इन आँखों से वो पिला दे

गर एक बूंद शराब का

नाचूँगा सारी उम्र

मैं दीवाना बन गया

वो कातिल निगाहे मुझको

इस कदर चाहती हैं

मैं रास्ते का फूल

नजराना बन गया

देखो किस कदर लोग

हुए हैं दीवाने

आज उनके दर पे ही

मयखाना बन गया

छलका जाम आँखों से

पैमाना बन गया

छलकते होठो से छू के

होठो को उन्होंने प्याला बना डाला

पास आई कुछ ऐसे वो

जिन्दगी को उन्होंने मधुशाला बना डाला

गर्म सांसो की छुअन हैं ऐसी

हर आहट की धरकन हैं ऐसी

कब तलक रोके हम भी

थिरकते बाहों को उन्होंने माला बना डाला

आँखों में मदभरी हया हैं छाई

जाम प्याले से छलक हैं आई

जाते जाते उनकी आँख भर आई

फ़िर से मेरे जिन्दगी को हाला बना डाला





Wednesday, March 17, 2010

बैरी पिया


उसके मन की ब्याकुल ब्यथा

हर आहट पे चौकस होती

पीपल के छाव तले

फिर मृगनयनी बाट जोहती

परदेसी पिपीहा छोर गया

विरह की ज्वाला जोड़ गया

सुर्यतपन अब सहनिए लगे

अंतःतपन पीड़ा के आगे

मेघदूत का राह देखती

कोई संदेशा लायेगा

बैरी पिया के आहट का

एक छोटी सी धुल दे जायेगा

मेघ दूत आये सिहरे से

मोटी मोटी बुँदे ले आये

सुर्यतपन कमजोर हुआ

पर अन्तः तपन को रोक न पाए

बारिश में भीगी मृगनयनी

अंदर की ज्वाला फिर भभकी

ज्वाला के चितचोर प्रवाह में

जलती रही वो जलती रही

बैरी पिया के राह जोहती

जलती रही वो जलती रही

Thursday, November 26, 2009

नारी तुम सम्मान की मूरत


नारी एक सम्मान की मुरत
पंक्ति को आलोकित देखा मैंने
सम्मान तो बाजार में बिकती
और मूरत घर पे रखा मैंने
नारी तेरा जीवन आमूल्य हैं
पंक्ति को आलोकित देखा मैंने
हर चौराहे पे मूल्य लगाये
फ़िर भी जीवन उसमे देखा मैंने
नारी अब आश्रित और कमजोर नही
पंक्ति को आलोकित देखा मैंने
हर दिन तलाशती नए आश्रय को
जीरो फिगर के चाह में उसको
और भी कमजोर देखा मैंने
आज मुझको शर्म हैं आता
नारी का जब ये रंग दिख जाता
माँ के रूप में सम्मानित थी नारी
बहन के रूप में प्यारी थी नारी
पत्नी के रूप में संगिनी थी नारी
आज एक अलग रूप हैं देखा
मनचलों की रंगीनी हैं नारी
नारी हैं तू सम्मान की मूरत
ना बनना किसी की ज़रूरत
न बनना किसी की ज़रूरत

Monday, October 5, 2009

नारी रंग


तुलिका लिया सौ रंग लिए
सोचा कुछ चित्रांकन करू
पुरुषों के इस आदम्य समाज में
नारी का मुल्यांकन करू

सोचा कहा से शुरु करू
जब घर वो लक्ष्मी बन आती हैं
कही रौनक कही उदासी
कही तो मातम ही छा जाती हैं
बाबुल के आंगन में वो
एक कली सी खिल जाती हैं
घर मर्यादा का बोझ लिए
समानता की होड़ लिए
गिरती हैं फिसलती हैं
मन में कुछ संकल्प लिए
पर्वत सिखा चढ़ जाती हैं

तभी घरांगन के दहलीज पे
एक बुलावा आता हैं
काफी मोलतोल हैं होती
फ़िर कही बात बन जाती हैं
बीते जीवन को भूल
नई रंग चढ़ जाती हैं
घर आँगन सब बदला
पहले बेटी अब पत्नी
के रूप में सजती हैं
घर आँगन को संसार समझ
एक नए रंग में रंगती हैं

ये रंग भी फीका हुआ तो
माँ का रंग चढ़ जाता हैं
उस छोटे से घर आँगन में
दादी वो बन जाती हैं
अमृतुल्या वो जीवन को छोर
मृत्य सैया पे सज जाती हैं
मर्यादा का बोझ लिए
जीते जी मर जाती हैं

कौन से रंग में रंगु नारी को
मैं कुछ समझ नही पता हु
पुरुषों के आदम्य समाज में
मैं नारी को शीश झुकता हु
नारी को शीश झुकता हु

Friday, October 2, 2009

प्यार को ब्यापार मत बनाओ तुम


इश्क आज एक नुमाइश हैं

हर किसी की एक ही फरमाइश हैं

घर दीवारों में छुपी मुहब्बत

आज राहों पे आ गई

कल तलक दुर थी लैला

आज मजनु के बाहों में आ गई

दिल किसको दीया ये बाते आम हो गई

हर चौराहे पे मिले राँझा

हीर सरेआम हो गई

इश्क महोब्बत आज बाते हैं फितुर की

सब दिल्लगी करते हैं दिल लगाने से

वो बिन मिले हमसे बदनाम हो गई

फुल को उंकार उन्होंने बना डाला

जीत को हार उन्होंने बना डाला

प्यार रिश्ता हैं भावनाओ का

उसको आज ब्यापार उन्होंने बना डाला

Sunday, September 27, 2009

प्यार का राज


किसी ने मुझसे पूछा
खुदा
ने ये प्यार को बनाया
जब
किस्मत में बूँद थी पानी की
तो
उसने सागर में क्यूँ बिठाया
दिल
दे के उसमें दर्द--दिल क्यों जगाया
अगर
पोछने थे अश्क हमारे
तो फिर प्यार का एहसास क्यूँ कराया
अगर प्यार बना ही दिया
तो
फ़िर हमपे ही क्यों आजमाया
तो
सुनो .......
अहसास
बिन प्यार के ये जिन्दगी नही होती
दिलके टूटे बिना मौसकी नही होती
गर खुदा ने प्यार बनाया ना होता
हमपे आजमाया ना होता
तो फरक हम क्या कर पाते
रुसवाई
और बेवफाई में
सोचो इस प्यार के बिना
क्या कुछ भी हमने पाया होता
रही
बात रोने और रुलाने की
तो
सुनो.......
तुम्हारे
दर्दे - -दिल से खुदा को कभी मजा नही आया
वो
तो तुम जैसे लोगो को दिल दे के ही पछताया
दिल
हर किसी को दे बैठते हो
पहली
नजर के तकरार में
जवानी
के सुमार में
पैसो
के झंकार में
और
भूल जाते हो
इतनी जल्दबाजी वाजिब नही
दिल देना ही हैं गर
तो थोड़ा रुको
देखो परखो
क्या वो तुम्हे भी चाहता हैं जितना तुम
फ़िर करो प्यार
तब खुदा की कभी ज़रूरत होगी
अश्क
पोछने के लिए
तब
ही कोई दिल टूटेंगे
बेवफाई
के दिवार से....
फ़िर
तुम ही कहती फिरोगी
खुदा ने अगर ये प्यार बनाया होता
हम रोते चिल्लाते हमपे कोई साया होता